Tuesday, 24 January 2017

वादा न सही मगर, एक इंसा को बचाने के लिए आ……..

वादा न सही मगर, एक इंसा को बचाने के लिए आ 
के एक बार मिल कर मुझ से, फिर बिछड़ जाने के लिए आ
मुमकिन है अब ये होश भी साथ ने दे मेरा 
मुझ बेहोश पर एक चादर चढ़ाने के लिए आ
कुछ तो मेरे पाक-ऐ-मोहोब्बत की जूनून को समझ 
के कभी तो तू भी मुझको मानाने के लिए आ
जनता हू अब वो रिस्ता-ऐ-रस्म-ऐ-दिल नहीं है 
खैर एक नया रिश्ता ही बनाने के लिए आ
किस किस को बताऊ मैँ, इस दिल के किस्से को 
तू मेरे लिए न सही, इस ज़माने के लिए आ
यकीं-ऐ-चिराग अब भी जल रहा है मेरे सीने मैँ 
एक आखरी अहसान कर, इसको बुझाने के लिए आ………………….!!
D K

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